का ढाई किलो का हाथ जब किसी पर पड़ता है, तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता है। उनके जिगरे का तो कहना ही क्या, गुस्सा आ जाए, तो वह हाथ से ही हैंडपंप उखाड़ देते हैं। फिर भी, बेटे को खतरनाक स्टंट करते देख बॉलिवुड के इस ऐक्शन किंग का दिल भी घबराने लगता था। बेटे की पहली फिल्म '' को लेकर हुई एक खास बातचीत के दौरान सनी ने खुद किया यह खुलासा। 'पल पल दिल के पास' आपके लिए काफी स्पेशल फिल्म होगी, क्योंकि इससे आप अपने बेटे करण देओल को लॉन्च कर रहे हैं?बिलकुल। यह बहुत स्पेशल है, क्योंकि जैसे बेताब में पापा ने मुझे इंट्रोड्यूस किया, वैसे ही इसमें मैं अपने बेटे को इंट्रोड्यूज कर रहा हूं। फर्क बस इतना है कि इसे मैं डायरेक्टर भी कर रहा हूं। हर बाप हमेशा सोचता ही है कि अपने बच्चों के भविष्य को किस तरह आगे लाना है। 'पल पल दिल के पास' टाइटिल भी मैंने इसलिए रखा, क्योंकि यह मेरा बहुत ही फेवरिट गाना है और पापा (धर्मेंद्र) की फिल्म का गाना है, तो क्यों न पोते की फिल्म का टाइटिल भी पल पल दिल के पास क्यों न हो? खास बात यह है कि 36 साल पहले 5 अगस्त 1983 को मेरी पहली फिल्म 'बेताब' रिलीज हुई थी। अब उसी 5 अगस्त को मेरे बेटे की पहली फिल्म का टीजर लॉन्च हो रहा है। आजकल नेपोटिजम के आरोप से बचने के लिए फिल्मी फैमिलीवाले खुद अपने बच्चों को लॉन्च नहीं करते, उनके दोस्त लॉन्च करते हैं। आपने करण की पहली फिल्म खुद प्रड्यूस-डायरेक्ट करने का फैसला क्यों किया?आजकल क्या है न कि हम कुछ देखते हैं, तो उसके पीछे पड़ जाते हैं कि आजकल यह हो रहा है, वैसा हो रहा है, पर ये बातें आजकल की नहीं है। यह हर किसी की पर्सनल बात है। ऐसा नहीं है कि मैं तय करके बैठा था कि मैं ही डायरेक्ट करूंगा, कोई और नहीं करेगा। मेरे पास कोई दूसरा डायरेक्टर अच्छी कहानी लाता, तो वह डायरेक्ट कर रहा होता। ये नेपोटिजम-वेपोटिजम, आदमी जी रहा है यार। मेरा मानना है कि हर इंसान को अपनी जिंदगी अपनी शर्तों पर जीने का हक है और उसे जीनी चाहिए। दूसरे क्या बोलेंगे, यह सोचकर जिएंगे, तो जी नहीं पाएंगे। कौन क्या सोचेगा, मैं यह सोचता ही नहीं हूं। जिसको जो सोचना है, वह सोचता रहे। हर इंसान की अपनी जिंदगी है और वह उसमें अपना रास्ता ढूंढकर आगे बढ़ता है, तो ये शब्द मुझे बड़े तंग करते हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि ये शब्द क्यों बनाए जाते हैं। मैं किसी का बुरा नहीं कर रहा हूं, किसी को तंग नहीं करता। अगर गलती से किसी को कर दिया, तो उसी वक्त माफी मांगता हूं। मैं इस तरह अपनी जिंदगी जीता हूं। बाकी, कौन क्या बोल रहा है, क्या कर रहा है, इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि कोई मुझे बदल नहीं सकता। हम कहां पहुंच गए, 'पल पल दिल के पास' की बात करते हैं। (हंसते हैं) फिल्म के लिए ऐक्ट्रेस का चुनाव करने में भी काफी मशक्कत होने की खबरें थीं। सहर को कैसे चुना? असल में मैं अपने दिमाग में सोच चुका था कि मुझे कैसी ऐक्ट्रेस चाहिए, इसलिए रियल में उसे ढूंढ़ना चुनौती रही। मैं चाहता था कि यह एक टीनएज लव स्टोरी है, तो बच्चों के चेहरे पर वह मासूमियत होनी चाहिए। साथ ही, वे ऐसे हों, जिनको हमारी सभ्यता के बारे में थोड़ा पता हो, वरना चीजें आर्टिफिशल लगेंगी, तो मेरी मेहनत उसी पर थी। करण को एक ऐक्टर के तौर पर कैसे देखते हैं? एक पिता और एक निर्देशक के तौर पर आपने उन्हें क्या सलाह दी?देखिए, अभी उनकी ऐक्टिंग के बारे में कुछ कहना जल्दबाजी होगी, क्योंकि अभी तो उनकी शुरुआत हुई है। रही बात सलाह की, तो जब आप उसी घर में हैं, तो हर रोज कुछ न कुछ सीखते हैं। फिर, जब एक ही प्रफेशन में आ गए, तो एक बार कह दिया कि बेटे, तुम्हें जो करना है करो, लेकिन ईमानदारी से करो। वहीं, डायरेक्टर के रूप में मैं ऐक्टर को कंफर्टेबल फील कराना पसंद करता हूं। मैं हमेशा खुद को ऐक्टर की जगह रखता हूं कि जब मैं एक नया ऐक्टर था, तो मुझे क्या प्रॉब्लम आती थी। मैं खुद ऐक्टर हूं, इसलिए मैं यह समझता हूं कि ऐक्टर से काम निकलवाना है, उसे डांटना नहीं है। इसलिए, उसे कंफर्टेबल फील कराना बहुत जरूरी है। उसे बात समझानी बहुत जरूरी है। एक बार वह बात समझ गया, तो काम आसान हो जाता है। इस फिल्म को बनाते वक्त आपके लिए सबसे बड़ा चैलेंज क्या रहा?सबसे बड़ा चैलेंज तो मेरे लिए यही था कि एक पिता होने के नाते मैं अपने बेटे से ठीक तरह से काम करा पाऊं। मेरे बेटे को भी यह डर रहा होगा कि पापा मेरे को डांटे न। अगर फादर ही फिल्म का हेड हो, तो बहुत मुश्किल होता है। मेरे पापा मेरे सामने हों या डायरेक्ट करें, तो मेरे लिए भी बहुत मुश्किल होगा। इसके अलावा, हमने पिक्चर जिन लोकेशंस पर शूट की है, वहां प्रकृति से हमें काफी लड़ना पड़ता। वहां मौसम और हालात ऐसे थे कि हमें तीन-चार बार जाना पड़ा। हमने ऐसी-ऐसी जगहों पर शूटिंग की हैं, जहां गाड़ी नहीं जाती थी। चढ़ाई करके जाना पड़ता था। हम वहीं टेंट लगाकर शूटिंग करते थे। फिर भी, हमने जो चीजें की हैं, स्टंट्स किए हैं, वह बहुत रियल किए हैं। जब हम वे स्टंट्स फिल्मा रहे थे और खराब मौसम के चलते टेंट्स उड़ने लगते थे, तो बहुत घबराहट होती थी। फिर, जब खुद का बेटा वे खतरनाक स्टंट कर रहा था, तो पिता के तौर पर मेरा दिल धक-धक करता था। इधर, एक डायरेक्टर के तौर पर मैं चाहता था कि शॉट सही हो। यह क्लैश था, फादर और डायरेक्टर के बीच। जहां सेफ्टी की बात आती है, तो यह क्लैश हमेशा आता है। जब मैं बेताब कर रहा था, तब पापा ने इंस्ट्रक्शन दिए थे कि मैं कोई स्टंट नहीं करूंगा, पर पापा फिल्म डायरेक्ट नहीं कर रहे थे, तो वे वहां थे नहीं, तो उन्हें पता नहीं था कि उनका बेटा क्या कर रहा है, लेकिन यहां तो मुझे खुद करवाना पड़ता था। तब दिल अंदर से एकदम धकधक करता था। अभी आपने खुद भी राजनीति में एक नई पारी भी शुरू की है, उस अनुभव के बारे में क्या कहेंगे? साथ ही, आप जिन फिल्मों में ऐक्टिंग करने वाले थे, उनका क्या होगा? देखिए, राजनीति के बारे में बाद में बात करेंगे। अभी फिल्म के बारे में बात करते हैं। जब पॉलिटिक्स के बारे में बात करता हूं, तो फिल्म के बारे में बात नहीं करता। अभी तो सारा फोकस इसी पर है। अपनी फिल्मों के बारे में भी इसके बाद देखेंगे कि क्या होगा, क्योंकि एक बाप के लिए तो सबसे बड़ी चीज अपना बेटा है। इस फिल्म पर मैं दो-ढाई साल से लगा हुआ हूं। प्रकृति की वजह से हमें काफी कठिनाई भी हुई। तीन-चार बार मनाली जाना पड़ा। जहां शूटिंग करनी थी, वहां कभी लैंडस्लाइड हो गई, तो कभी बर्फ पड़ गई, कभी बहुत बारिश होने लगी, वरना एक ही शेड्यूल में फिल्म पूरी करनी थी। वैसे, यह अंतर कर पाना भी आसान नहीं है कि अभी मैं ऐक्टर-डायरेक्टर हूं, तो उसके बारे में बात करूंगा, अभी पॉलिटिशन हूं, तो उस पर बात करूंगा?ऐसा कुछ नहीं है। यह मेरी जिंदगी का इंट्रेस्टिंग फेज है। मैं बहुत सी नई चीजों के बारे में जान-समझ रहा हूं, लेकिन इस वक्त मेरा फोकस यहां पर है। बाकी, काम भी कर रहा हूं, लेकिन अभी फोकस बेटे पर है। एक फादर के तौर पर यह देखना पड़ता है कि आप अपनी फैमिली को कैसे संभाल रहे हैं, अगर यहां नहीं संभाल सकते, चीजें सही नहीं कर सकते, तो देश के लिए क्या करोगे? (हंसते हैं।)
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